30 हजार से 1.50 लाख तक तय रिश्वत, बिना परीक्षा-इंटरव्यू सीधे नियुक्ति
रिश्वत देने वालों को तुरंत नियुक्ति, और पैसे न देने वालों को जवाब “पोस्ट भर चुकी है”

बैतूल/घोड़ाडोंगरी। आदिवासी अंचल घोड़ाडोंगरी ब्लाक में आरोग्यम उपस्वास्थ्य केंद्रों की भर्ती प्रक्रिया अब भ्रष्टाचार की मिसाल बनती जा रही है। ऑपरेटर (क्लर्क) भर्ती में नियमों को ताक पर रखकर लाखों रुपये की रिश्वत लेकर नियुक्तियां किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। सूत्रों का दावा है कि यह पूरी भर्ती प्रक्रिया तयशुदा ‘रेट कार्ड’ के तहत खुलेआम सौदेबाजी में बदल दी गई ।
जानकारी के अनुसार नवंबर माह में घोड़ाडोंगरी ब्लाक के सभी आरोग्यम उपस्वास्थ्य केंद्रों के लिए डाटा एंट्री ऑपरेटर (क्लर्क) की भर्ती निकाली गई थी। नियम स्पष्ट थे— हर उपस्वास्थ्य केंद्र में संबंधित ग्राम पंचायत के एक योग्य ग्रामीण अभ्यर्थी की नियुक्ति। लेकिन जमीनी हकीकत ने इन नियमों की धज्जियां उड़ा दीं।
रिश्वत का ‘रेट कार्ड’ उजागर
नाम न छापने की शर्त पर विभाग से जुड़े सूत्रों और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े लोगों ने चौंकाने वाले खुलासे किए—
- 1 से 15 नवंबर: 30,000 से 50,000
- 15 से 30 नवंबर: 50,000 से 1,00,000
- 1 दिसंबर के बाद: 1,00,000 से 1,50,000
सूत्रों के मुताबिक, जो पैसा देता गया, उसकी फाइल आगे बढ़ती गई, और जो पैसे नहीं दे पाया, उसे दो टूक जवाब दे दिया गया “पोस्ट भर चुकी है।”
BMO कार्यालय की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस पूरे खेल में विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) घोड़ाडोंगरी कार्यालय से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि रिश्वत की रकम इसी माध्यम से वसूली गई। हालांकि, अब तक संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
बिना परीक्षा, बिना इंटरव्यू—सीधी भर्ती
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस भर्ती में न तो कोई लिखित परीक्षा ली गई और न ही साक्षात्कार। ग्रामीण आरोग्यम योजना के तहत निकली भर्ती में नगरपालिका, नगर परिषद और शहरी क्षेत्र के अभ्यर्थियों को पैसे लेकर नियुक्त कर दिया गया, जबकि वे संबंधित गांव के निवासी भी नहीं हैं।
ग्रामीण और आदिवासी युवाओं के हक पर डाका
इस कथित घोटाले ने ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र के योग्य युवाओं के सपनों पर पानी फेर दिया। जिन युवाओं के लिए यह भर्ती थी, वे आज भी बेरोजगार हैं, और बाहर से आए अभ्यर्थी रिश्वत के दम पर सरकारी कुर्सी पर बैठ गए।
जांच होगी या फाइलों में दबेगा सच, अब सवाल सीधे-सीधे प्रशासन से है ?
1. क्या जिला प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराएगा ?
2. क्या ग्रामीण और आदिवासी युवाओं को उनका संवैधानिक हक मिलेगा ?
3. या फिर यह भर्ती घोटाला भी कागजों में दफन कर दिया जाएगा ?

